“काला कानून” (आचार्य अवधेश झा)

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“काला कानून”

जटिल कुटिल मानवता पर हीं,प्रश्नचिन्ह है यू जी सी!

शिक्षा दीक्षा समता पर भी, प्रश्नचिन्ह है यू जी सी!!

है काला कानून देश का,

भेद भाव बढ़वायेगा!

निर्मल बालापन में हीं ये,

भेद भाव दर्शायेगा!

ऐसे चक्र कुचक्रो में हीं, उलझन बढ़ बैठी ऐसी!!जटिल कुटिल मानवता।

घर घर में अब बच्चे बूढ़े,

खून के आँसू रोते हैं!

दिन दुपहरी सांझ सवेरे

चैन से कहां सोते हैं!!

बेवजह कानून थोपना,

ये लाचारी है कैसी!

जटिल कुटिल मानवता।

उद्वेगों ऊफानो में हीं,

बच्चे बूढ़े जीते हैं!

युवा वर्ग बस सोंच सोंच कर, खून के आँसू पीते हैं!!

अब निश्चय कर आर पार की, लड़नी लड़ाई है ऐसी!

जटिल कुटिल मानवता••••

खो जाए जब बुद्धि विवेक तो,

मानव मानव न रह पाएगा!

ये कानून सभी मानव को, 

जेल बेल करवायेगा!!

इस आशय से हर घर घर से,

धुर विरोध करनी ऐसी!

जटिल कुटिल मानवता।

 

©आचार्य अवधेश झा

गंघटी आश्रम,धर्मागत पुर पिलखी

मुरौल मुजफ्फरपुर

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