संघर्ष, साधना और सुरों की अनुपम विरासत : लोकगायक अशोक शर्मा जी की प्रेरणादायी जीवनगाथा

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रिपोर्ट – कुमार संदीप, मुजफ्फरपुर (बिहार)

मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा अंचल अंतर्गत ग्राम सिमरा के निवासी आदरणीय अशोक शर्मा जी एक ऐसे संगीत साधक हैं, जिनका जीवन संघर्ष, संगीत और श्रद्धा का अनुपम संगम है। साधारण परिवार में जन्म लेकर उन्होंने अपने जीवन की कठिन राहों को अपनी मेहनत, ईमानदारी और संगीत साधना से असाधारण बना दिया।

उनका जन्म ग्राम अखिया स्थित ननिहाल में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा श्री फतह नारायण राजकीय मध्य विद्यालय, सिमरा से तथा मैट्रिक तक की पढ़ाई श्री मोहन उच्च विद्यालय, सिमरा से पूर्ण हुई। आगे की शिक्षा राजकीय इंटर महाविद्यालय, जिला स्कूल में आरंभ हुई, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़ने पर विवश कर दिया। वर्ष 1988 में पिता जी के असामयिक निधन ने पूरे परिवार की जिम्मेदारियाँ उनके कंधों पर ला दीं। यह समय उनके जीवन का अत्यंत कठिन दौर था।

 

किन्तु जिनके भीतर कला, आस्था और आत्मविश्वास जीवित हो, उन्हें परिस्थितियाँ कभी पराजित नहीं कर सकतीं। पिता जी के पास हारमोनियम, ढोलक और झाल जैसे वाद्ययंत्र थे। अशोक जी ने पहले झाल, फिर ढोलक और अंततः वर्ष 1995 में हारमोनियम सीखना प्रारंभ किया। उनके संगीत गुरु स्वर्गीय चन्देश्वर प्रसाद यादव जी थे, जो दरभंगा रेडियो स्टेशन के प्रसिद्ध लोकगीत गायक रहे। गुरु के सान्निध्य में उन्होंने संगीत को केवल सीखा ही नहीं, बल्कि उसे आत्मा में उतार लिया।

 

उनकी मधुर वाणी और भक्ति से ओतप्रोत गायन ने धीरे-धीरे लोगों के हृदय में विशेष स्थान बना लिया। वर्ष 1999 में नेहरू युवा केन्द्र द्वारा प्रखंड स्तर पर उन्हें सम्मानित किया गया। वर्ष 2001 में वे वार्ड सदस्य चुने गए। वर्ष 2008 से 2013 तक बिहार शिक्षा परियोजना के अंतर्गत सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस दौरान गाँव-जवार से लेकर पटना के गांधी मैदान तक उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उद्भव कला केन्द्र, लीची अनुसंधान मुशहरी, लोकजमघर कार्यक्रम तथा नेहरू युवा केन्द्र के राज्य स्तरीय आयोजनों में उनकी प्रस्तुति विशेष रूप से सराही गई।

 

अशोक शर्मा जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जीवन की इतनी कठिनाइयों के बाद भी उनके चेहरे की विनम्र मुस्कान कभी नहीं बदली। उनके भीतर आज भी वही सरल ग्रामीण आत्मा जीवित है, जो हर किसी को अपनापन देती है। वे केवल कलाकार नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की जीवित आत्मा हैं।

 

आज भी जब अशोक जी प्रभु श्रीराम, माता जानकी और हनुमान जी को समर्पित भजन गाते हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। विशेषकर “जेहने किशोरी मोरी तेहने किशोर से” और “ओ मोरे मोहना जुलूम तोरे नैन” जैसे भजनों की प्रस्तुति श्रोताओं को भावविभोर कर देती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं मां सरस्वती उनकी वाणी में विराजमान हों। स्वयं अशोक जी भी अनुभव करते हैं कि गायन के समय मां सरस्वती की दिव्य उपस्थिति उनके आसपास बनी रहती है।

 

संगीत साधना के साथ-साथ वे आजीविका हेतु साइकिल बनाने का कार्य भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करते हैं। यह उनकी सादगी, श्रमशीलता और आत्मसम्मान का सबसे सुंदर परिचय है। मुख्यमंत्री कलाकार पेंशन योजना हेतु उनका चयन होना उनके संघर्षमय जीवन की सार्थक उपलब्धि है और पूरे समाज के लिए गर्व का विषय भी।

 

अशोक शर्मा जी केवल बंदरा प्रखंड ही नहीं, बल्कि पूरे मुजफ्फरपुर और बिहार की सांस्कृतिक धरोहर हैं। उनकी आवाज़ में भक्ति है, विनम्रता है, लोकजीवन की मिट्टी की सुगंध है और आत्मा को छू लेने वाली संवेदना है।

 

वे उन विरले लोगों में हैं, जो यह सिखाते हैं कि महान बनने के लिए बड़े शहर, ऊँची डिग्रियाँ या अपार धन की आवश्यकता नहीं होती — एक सच्चा हृदय, ईश्वर में अटूट विश्वास और अपनी मिट्टी से प्रेम ही इंसान को अमर बना देता है।

 

इनके व्यक्तित्व पर कुछ शब्द लिख पाना मेरे जैसे साधारण विद्यार्थी के लिए भी सौभाग्य की बात है। प्रभु श्रीराम, माता जानकी और मां सरस्वती की असीम कृपा सदा इनके ऊपर बनी रहे — यही हृदय से प्रार्थना है।

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