“हनुमान अंश (“Hanuman Ansh”)
गृह त्याग किया, संकल्प लिया,
सांसारिक सुख सब छोड़ दिया।
लक्ष्मण दास चले उस राह पर,
जीवन राम को अर्पित किया॥
ध्यान मग्न थे, भाव-विभोर थे,
नयनों में करुणा की धार।
तन पर रूप कंबली वाले का,
हृदय में बसे रघुवर सरकार॥
जहाँ पड़े चरण, पावन हुई भूमि,
जहाँ लिया नाम, वो धाम हुआ।
नीम करौली बाबा के नाम से,
जग में गूँजा श्रीराम नाम॥
न कोई आडंबर, न कोई अभिमान,
सादा सा चोला, पावन मुस्कान।
रोम-रोम में बसे श्रीराम,
रग-रग में बहती भक्ति की तान॥
कहते साधु, कहते हैं संत,
महिमा तेरी अपरंपार।
संकटमोचन रूप में बाबा,
करते सबका बेड़ा पार॥
दीन-दुखी जो द्वार पे आए,
बाबा ने गले लगाया।
जिसके मन में पीड़ा थी,
उसको अपना प्यार दिया॥
जाति-धर्म का भेद न देखा,
सबको अपना मान लिया।
राम-नाम की ज्योति जलाकर,
जीवन का अँधियारा हर लिया॥
जीवन की हर कठिन घड़ी में,
बाबा तुम विश्वास बने।
डगमग होती इस नैया के,
तुम ही तो पतवार बने॥
जो भी आया कैंची धाम,
खाली हाथ न लौटा कोई।
बाबा का जो नाम सुमिरता,
दूर हुई हर विपदा कोई॥
हे हनुमान के अंश स्वरूप,
तुमको शत-शत नमन हमारा।
भवसागर से पार लगाने,
बाबा, तुम ही एक सहारा॥
रचनाकार – पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)




