उनतीस वर्षों की फौजी यात्रा
30 अगस्त मेरे जीवन की उन तारीखों में से एक है, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। मेरे लिए यह केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि मेरे जीवन की दिशा बदल देने वाला दिन है। इसी दिन, वर्ष 1997 में, मात्र 16 वर्ष 8 माह की उम्र में मैंने भारतीय सेना की वर्दी पहनी थी। उस समय मैं बहुत छोटा था। जीवन की राहें अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं थीं और भविष्य की कल्पना भी सीमित थी। लेकिन उस एक निर्णय ने मेरे जीवन को ऐसी दिशा दी, जिसने आने वाले उनतीस वर्षों में मुझे न जाने कितने अनुभवों, चुनौतियों, अवसरों और सीखों से परिचित कराया।
मेरी सैनिक यात्रा का आरंभ रानीखेत स्थित कुमाऊँ रेजीमेंट सेंटर से हुआ। पहाड़ों की ठंडी हवाओं और कठिन प्रशिक्षण के बीच एक किशोर मन धीरे-धीरे सैनिक जीवन के अनुशासन और जिम्मेदारियों को समझने लगा। प्रशिक्षण ने केवल शरीर को मजबूत नहीं बनाया, बल्कि मन को भी दृढ़ता प्रदान की और जीवन के प्रति एक नई दृष्टि दी। इसी दौरान 26 जनवरी 1998 की गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने का सौभाग्य भी मिला। तिरंगे की छाया में वर्दी पहनकर कदमताल करने का वह गौरवपूर्ण क्षण आज भी मेरी स्मृतियों में उतना ही ताजा है। उस समय शायद मुझे यह एहसास नहीं था कि आने वाले वर्षों में यही वर्दी मेरे जीवन की पहचान बन जाएगी।
25 सितंबर 1998 को मुझे 11 कुमाऊँ बटालियन ( वीर अहीर बटालियन) में सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ और यहीं से मेरे सैनिक जीवन का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। इसके बाद सेवा के दौरान देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रहने और कार्य करने का अवसर मिला। अरुणाचल प्रदेश की ऊँची पहाड़ियों, घने जंगलों, अत्यधिक वर्षा और दुर्गम परिस्थितियों से लेकर पंजाब के फिरोजपुर मैदानी इलाकों की गर्मी और सर्दी तक, जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी और चुनौतीपूर्ण भूभाग से लेकर राजस्थान सूरतगढ़ की तपती रेत और गर्म हवाओं तक, शिमला की ठंडी पहाड़ी जलवायु और बेलगावी, हैदराबाद, ग्वालियर तथा देश की अलग-अलग भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों तक मेरी यात्रा विस्तृत होती गई। देश से बाहर कांगो में सेवा करने का अवसर मिला तो एक बिल्कुल अलग भूगोल, वातावरण और सामाजिक परिवेश को करीब से देखने-समझने का अनुभव प्राप्त हुआ। इस प्रकार मेरी सैनिक यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा नहीं रही, बल्कि भारत के विभिन्न भूभागों और देश से बाहर की धरती को समझने की भी यात्रा बन गई।
मेरे लिए ये स्थान केवल पोस्टिंग के नाम नहीं थे। ये मेरे जीवन की अलग-अलग पाठशालाएँ थीं। कहीं पहाड़ रास्ता रोकते थे, कहीं घने जंगल अपनी कठिनाइयाँ सामने रखते थे, कहीं बारिश लगातार परीक्षा लेती थी, कहीं कड़ाके की ठंड शरीर को चुनौती देती थी और कहीं रेगिस्तान की तपिश धैर्य की परीक्षा लेती थी। मौसम बदलते रहे, भौगोलिक परिस्थितियाँ बदलती रहीं, रहने-सहने की परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली, कर्तव्य के प्रति मेरा समर्पण। प्रकृति के हर रूप के साथ सामंजस्य बैठाते हुए आगे बढ़ना सैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। इन परिस्थितियों ने मुझे सिखाया कि मनुष्य की वास्तविक क्षमता सुविधा में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में सामने आती है।
मेरे सैनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण और संतोष देने वाला अध्याय पाँच वर्षों तक प्रशिक्षक के रूप में योगदान देना भी रहा। इनमें लगभग दो वर्ष ( 2005 से 2007तक) कुमाऊँ रेजीमेंट सेंटर में शारीरिक प्रशिक्षक के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। नए सैनिकों को शारीरिक रूप से सक्षम बनाने, उनमें अनुशासन विकसित करने और कठिन प्रशिक्षण के लिए तैयार करने की जिम्मेदारी मेरे लिए केवल एक ड्यूटी नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी थी। जिस प्रशिक्षण की कठिनाइयों से मैं स्वयं गुजर चुका था, उसी अनुभव को आगे आने वाले जवानों तक पहुँचाना मेरे लिए गर्व का विषय रहा। किसी नए जवान को अपनी क्षमता पहचानते, कठिन परिश्रम करते और धीरे-धीरे एक मजबूत सैनिक के रूप में विकसित होते देखना अपने आप में एक सुखद अनुभव था।
इसके बाद तीन वर्षों तक (2023 से 2026 तक) प्लाटून कमांडर विंग, बेलगावी में इंस्टेक्टर के रूप में योगदान देने का अवसर मिला। वहाँ प्रशिक्षण और मूल्यांकन की जिम्मेदारियों ने मेरे अनुभव को एक नया आयाम दिया। एक प्रशिक्षक के रूप में जहाँ मुझे शारीरिक क्षमता और अनुशासन पर काम करने का अवसर मिला, वहीं इंस्टेक्टर के रूप में नेतृत्व, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, कार्यकुशलता और जिम्मेदारी के विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का अवसर मिला। इन पाँच वर्षों ने मुझे यह समझाया कि एक सैनिक का विकास केवल उसके व्यक्तिगत प्रयास से नहीं होता बल्कि उसके पीछे अच्छे प्रशिक्षक, सही मार्गदर्शन, अनुशासन और पूरी टीम का सहयोग भी उतना ही आवश्यक होता है।
इसी सैनिक जीवन के दौरान मेरे भीतर रेजीमेंट को परिवार मानने की भावना और अधिक गहरी होती चली गई। मेरे लिए रेजीमेंट केवल एक संगठन या कार्यस्थल नहीं रही बल्कि यह धीरे-धीरे एक बड़े परिवार का रूप लेती गई। एक ही थाली में एक साथ बैठकर भोजन करना, साथ मिलकर काम करना, सुख-दुःख में एक-दूसरे के साथ खड़ा रहना और आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे का हाथ थाम लेना आदि यही वे अनुभव थे, जिन्होंने मेरे भीतर आपसी भाईचारे और टीम स्प्रिट की भावना को मजबूत किया। वहाँ मैंने जाना कि फौज में व्यक्ति अकेला नहीं होता, उसकी ताकत उसकी पूरी टीम होती है। साथ मिलकर काम करने से न केवल कार्य आसान होता है, बल्कि विश्वास, अपनापन और आत्मीयता भी पैदा होती है। यही भावना मेरे सैनिक जीवन की सबसे बड़ी सीखों में से एक बन गई।
इस पूरी यात्रा में मेरे सीनियर्स और दोस्तों का साथ मेरे लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं रहा। उनके साथ बिताया हुआ समय आज मेरी सबसे सुंदर स्मृतियों का हिस्सा है। चाहे प्रशिक्षण के दिन रहे हों, कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी का समय रहा हो या सेवा के दौरान मिले सामान्य और सहज पल, हर समय की अपनी एक अलग कहानी है। मेरे सीनियर्स ने हमेशा मुझे सही मार्गदर्शन दिया, मेरी गलतियों को सुधारने का अवसर दिया और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। उनके अनुभवों और सीखों से मैंने बहुत कुछ पाया। वहीं दोस्तों का स्नेह, अपनापन और साथ हर परिस्थिति में मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत बना रहा। फौजी जीवन में परिवार से दूर रहकर जो अपनापन साथियों के बीच मिलता है, उसकी अनुभूति शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। कई रिश्ते खून के नहीं होते, फिर भी वे जीवनभर के लिए दिल में बस जाते हैं। मेरे फौजी साथियों के साथ बिताया हुआ समय भी ऐसी ही अमूल्य स्मृतियों से भरा है।
इन सबके साथ मेरे परिवार का योगदान मेरी इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार रहा है। मेरे माता-पिता ने मुझे जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और परिश्रम, ईमानदारी तथा संघर्ष का मूल्य सिखाया। मैं अपनी उपलब्धियों के पीछे उन्हें सबसे बड़ा उत्प्रेरक मानता हूँ। एक सैनिक की यात्रा केवल उसकी अपनी यात्रा नहीं होती बल्कि उसके पीछे उसका परिवार भी उतने ही धैर्य और त्याग के साथ खड़ा होता है। मेरी अनुपस्थिति में परिवार की जिम्मेदारियों को निभाना, कठिन परिस्थितियों में मनोबल बनाए रखना और हर कदम पर मेरा उत्साह बढ़ाना, मेरी पत्नी और परिवार के इस सहयोग को मैं कभी नहीं भूल सकता। मेरे बच्चों ने भी मुझे निरंतर आगे बढ़ने और कुछ बेहतर करने की प्रेरणा दी। जब मैं अपनी ड्यूटी में व्यस्त रहा, तब मेरे परिवार ने मेरी अनुपस्थिति को स्वीकार करते हुए घर और रिश्तों की जिम्मेदारियों को संभाला। इसलिए मेरी सफलता में जितना योगदान मेरी मेहनत का है, उतना ही मेरे परिवार के प्रेम, विश्वास, धैर्य और त्याग का भी है।
सेना ने मुझे केवल सैनिक बनने का अवसर नहीं दिया, बल्कि अपने व्यक्तित्व को निरंतर विकसित करने के अनेक अवसर भी प्रदान किए। फौज में आने से पहले मैं केवल दसवीं कक्षा उत्तीर्ण था, लेकिन सेना में रहते हुए मैंने अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाया और हिंदी विषय में मास्टर ऑफ आर्ट्स प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। इसके साथ-साथ सेना के नौ विभिन्न पाठ्यक्रम (कोर्सेज) करने का अवसर भी मिला और उनमें मेरे बहुत ही परिणाम अच्छे रहे। खेलकूद, प्रशिक्षण, शिक्षा और विभिन्न जिम्मेदारियों के बीच स्वयं को आगे बढ़ाते रहना मेरे जीवन का हिस्सा बनता गया। मुझे हमेशा लगा कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और व्यक्ति को जब भी अवसर मिले, उसे अपने ज्ञान और क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।
सेना की व्यस्त दिनचर्या के बीच मेरे भीतर का लेखक भी धीरे-धीरे आकार लेता रहा। अलग-अलग स्थानों की प्रकृति, वहाँ का जीवन, साथियों के अनुभव, परिवार से दूरी, सैनिक जीवन की घटनाएँ और समाज को करीब से देखने का अवसर, इन सबने मेरे भीतर विचारों का एक संसार बनाया। जब भी समय मिला, मैंने उसे लेखन के साथ बिताया। विचारों को कागज पर उतारना मेरे लिए केवल शौक नहीं रहा, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया। वर्ष 2017 में मेरी पहली पुस्तक ‘देश की बात’ प्रकाशित हुई। उस पहली पुस्तक से शुरू हुई मेरी साहित्यिक यात्रा आज एकल संग्रह की 15 पुस्तकों और सांझा संग्रह की 19 पुस्तकों तक पहुँच चुकी है। मेरे लिए यह यात्रा विशेष इसलिए है क्योंकि लेखन मैंने किसी अलग दुनिया में जाकर नहीं, बल्कि सैनिक जीवन की व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच रहते हुए किया।
अक्सर लोग कहते हैं कि “फौज में समय कहाँ मिलता है?” मैं अपनी यात्रा को देखकर यही कहता हूँ कि समय शायद सभी के पास समान होता है, अंतर केवल उसके सदुपयोग का होता है। मैंने भी यही प्रयास किया कि ड्यूटी के समय पूरी निष्ठा से ड्यूटी करूँ और जो समय स्वयं के विकास के लिए मिले, उसका सदुपयोग करूँ। सेवा के साथ-साथ शिक्षा, फौजी पाठ्यक्रम, खेलकूद, लेखन और गायन को अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखा। मैंने समय को कभी केवल घड़ी की सुइयों से नहीं देखा, बल्कि उसे अवसर के रूप में देखने का प्रयास किया। यही कारण है कि व्यस्तता के बीच भी कुछ सीखने, लिखने और स्वयं को बेहतर बनाने का सिलसिला चलता रहा। पहाड़ की ऊंची ऊंची चोटियों पर हरियाणवी रागनी गाने का अंदाज ही कुछ और होता है तथा लोहे का जरीकन व टिफिन बजाकर संगीत देने की कला उससे भी अनोखी प्रतीत होती है।
इन उनतीस वर्षों में शरीर ने अलग-अलग मौसमों को सहा और मन ने अलग-अलग परिस्थितियों को समझा। पहाड़ों की ठंड, मैदानों की गर्मी, रेगिस्तान की तपिश, बारिश की कठिनाइयाँ और दूर-दराज के क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियाँ, इन सबके बीच सैनिक जीवन आगे बढ़ता रहा। मैंने महसूस किया कि सैनिक केवल अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करता, वह स्वयं को भी हर दिन नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालता है। यही निरंतर संघर्ष उसे भीतर से मजबूत बनाता है। कभी प्रकृति परीक्षा लेती है, कभी परिस्थितियाँ, कभी जिम्मेदारियाँ और कभी स्वयं से मुकाबला करना पड़ता है। लेकिन हर चुनौती के बाद मनुष्य अपने भीतर कुछ नया पाता है।
आज 30 अगस्त 2026 को जब मैं अपनी सैनिक सेवा के 29 वर्ष पूरे होने के इस पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखता हूँ तो रानीखेत के प्रशिक्षण केंद्र से लेकर 11 कुमाऊँ और देश-विदेश के अलग-अलग सेवा-स्थलों तक की पूरी यात्रा एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूम जाती है। वह किशोर, जिसने 16 वर्ष 8 माह की उम्र में सेना की वर्दी पहनी थी, आज 29 वर्षों की स्मृतियों, अनुभवों और उपलब्धियों के साथ अपने सफर को देख रहा है। इन वर्षों में मैंने केवल समय नहीं बिताया, बल्कि समय को जिया है। मैंने सैनिक जीवन से अनुशासन लिया, शिक्षा से ज्ञान लिया, प्रशिक्षण से नेतृत्व सीखा, साथियों से भाईचारा पाया, परिवार से शक्ति ली, साहित्य से संवेदना ली और अनुभवों से जीवन को समझने की कोशिश की।
मैं भारतीय सेना का हृदय से आभारी हूँ। इस वर्दी ने मुझे अनुशासन दिया, स्वस्थ रखा, आत्मविश्वास दिया, जिम्मेदारी का बोध कराया और मेरे परिवार का भी ख्याल रखा। एक सैनिक के रूप में जो कुछ सीखने और पाने का अवसर मुझे मिला, उसके लिए मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगा। मेरी 11 कुमाऊँ, कुमाऊँ रेजीमेंट और भारतीय सेना के प्रति मेरे मन में हमेशा सम्मान और आभार रहेगा। इन संस्थाओं ने मुझे केवल सैनिक नहीं बनाया, बल्कि जीवन को समझने और उसे सकारात्मकता के साथ जीने की दृष्टि भी दी।
आज मेरे पास पीछे देखने के लिए 29 वर्षों की अनगिनत स्मृतियाँ हैं और आगे बढ़ने के लिए अभी बहुत-सा जीवन बाकी है। इस यात्रा में मेरे माता-पिता का आशीर्वाद, परिवार का विश्वास, पत्नी का सहयोग, बच्चों का स्नेह, सीनियर्स का मार्गदर्शन और दोस्तों का प्यार मेरे साथ रहा है। इसलिए इन उनतीस वर्षों की कहानी केवल मेरी कहानी नहीं है बल्कि यह उन सभी लोगों के प्रेम, विश्वास, त्याग और सहयोग की कहानी भी है, जिन्होंने मेरी यात्रा को आसान, सार्थक और यादगार बनाया।
जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, जिस दिन मात्र 16 वर्ष 8 माह की उम्र में मैंने भारतीय सेना की वर्दी पहनी थी, तो मन के भीतर से एक ही भाव उठता है कि उस दिन लिया गया निर्णय मेरे जीवन का सबसे सौभाग्यशाली निर्णय था। यदि जीवन मुझे फिर उसी मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर दे, जहाँ एक ओर सामान्य जीवन हो और दूसरी ओर भारतीय सेना की वर्दी, तो मैं आज भी उसी वर्दी को चुनूँगा।
यह यात्रा मेरे लिए केवल सैनिक की यात्रा नहीं थी। यह स्वयं को खोजने, गढ़ने, सीखने और निरंतर बेहतर बनाने की यात्रा थी। बदलते स्थानों, बदलते मौसमों, बदलती परिस्थितियों, वरिष्ठों के मार्गदर्शन, साथियों के स्नेह और परिवार के अटूट विश्वास के बीच मैंने एक ही बात सीखी, परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी बदल जाएँ, यदि संकल्प अडिग हो, टीम का साथ हो और मन में सीखने की इच्छा बनी रहे, तो हर कठिन रास्ता जीवन की एक सुंदर स्मृति बन जाता है।
इन उनतीस वर्षों की इस यात्रा के लिए मैं अपने माता-पिता, अपने परिवार, अपने सीनियर्स, अपने दोस्तों, अपने सभी सहकर्मियों, अपनी 11 कुमाऊँ, कुमाऊँ रेजीमेंट और भारतीय सेना के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। मेरी यह यात्रा आज भी जारी है और मेरी कोशिश रहेगी कि आने वाले वर्षों में भी मैं अपने अनुभव, अपनी लेखनी और अपनी सकारात्मक सोच के माध्यम से समाज और आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ सार्थक कर सकूँ।
उनतीस वर्ष बीत गए, पर वर्दी के प्रति सम्मान आज भी उतना ही है, बल्कि समय के साथ और गहरा हुआ है। जय हिंद!
“वीर अहीर, अजीत हैं अभीत हैं ”
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नफे सिंह योगी मालड़ा
महेंद्रगढ़, हरियाणा




